भारत बंद जैसे आन्दोलनों से नेताओं को होता है लाभ
लेख-नागेन्द्र प्रसाद रतूड़ी

किसी निर्दोष को बचाने के लिए यदि कोर्ट कुछ सुधार करना चाहे तो विरोध क्यों.सेाचिए कल कोई सिरफिरा नेता संसद में ठीक इसी प्रकार का कानून सवर्णों के पक्ष में ले आये और एक विशेष वर्ग के निर्दोष लोग जेल जाने लगें तो क्या होगा?मैंने ऐसे ऐसे अधिकारियों को देखा है जो आरक्षित वर्ग के होते हुए भी सवर्ण अधिकारियों से बहुत अधिक सम्मान पाते हैं.क्यों? क्योंकि उन्होंने अपना काम ईमानदारी से किया है.और ऐसे सवर्ण अधिकारियों को भी देखा है जिनके नाम सुनते ही मुंह का जायका ही खराब हो जाता है.
देश के अच्छे अधिकारियों,नेताओं व अच्छी मीडिया का काम है कि वह जनता को समझाएं कि कुछ लोग उनको आपस में लड़ा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं.
अब नेता तो खिसक लिए आग लगा कर, अगर कोई पकड़ा भी जाएंगा तो संभव है कि थाना स्तर से ही छूट जाय ।अगर मामला कोर्ट तक गया तो उनके पास इतना पैसा है कि वह वकीलों की फौज खड़ी कर देंगा। पर जो आम आदमी है वहअपना काम जो करेगा या मुकदमा जो लड़ेगा,।
मान लिया जाय कि  कभी कोर्ट का कोई ऐसा फैसला आ भी जाय जिस पर किसी व्यक्ति या वर्ग को ऐसा लगे कि उसके साथ अन्याय हुआ है तो वह अपनी बात कोर्ट में ही रखे कि उसके साथ अन्याय हुआ है.मुझे या मेरे वर्ग के प्रति कोर्ट से तथा कथित अन्याय हुआ है और इस निर्णय को बदलवाने के लिए वह कोर्ट में ही क्यों नहीं जाता जो उचित,अहिंसक भी है और न्यायपूर्ण। बहुत से लोग कहेंगे कि इसके लिए बहुत पैसा चाहिए,तो बजाय सड़कों पर उतरने के अगर यह समर्थक एक छोटी राशि एकत्र करते तो यह धन भी जुट सकता था अखिल भारतीय बंद करवाने पर भीड़ एकत्र कर हिंसा का तांडव करे तो इससे सरकार के फैसले भले ही प्रभावित हो सकते हैं पर कोर्ट के नहीं।क्योंकि कोर्ट जो फैसला देती है वह कानून के आधार पर होता है.
ऐसा कानून जो निर्दोष को पीड़ा दे,जो निर्दोष को बिना अपराध जेल में डाल दे में यदि सुप्रीम कोर्ट कोई सुधार करता है तो वह स्वागत योग्य होना चाहिए. पर हम आम जन जान ही नहीं पाते कि हमारा नेतृत्व हमारी भावना भड़का कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है और जिस वक्त जनता भावना में वह कर यह सब कर रही होती है, वे अपने वातानुकूलित कमरों में बैठ कर दीवार साईज के टी वी पर सबका आनंद लेते हुए गुणा भाग करने में लगे होते हैं कि इससे उसके कद में कितना इजाफा हुआ है। हां शाम को वे मीडिया में बन्द को सफल बता सरकार को चेतावनी देते नजर आएंगे। दो अप्रैल को जो बबाल एससी/एसटी एक्ट के नाम पर हुआ जो हिंसा की गयी उसमें बबाल या हिंसा करने वाले अधिकांश लोगों को यह पता ही नहीं रहा होगा कि आखिर यह मामला है क्या?और न यह जानकारी रही होगी कि वे ‘इस्तेमाल’ किये जा रहे हैं। उन्हें तो केवल यह बताया गया होगा कि उनके रक्षक ऐक्ट को बदल दिया गया है।
हिंसा में मारे गये लोगों को कभी कोई पार्टी अपने कोष से मुआवजा नहीं दिया जाता।हां सरकार से मुआवजे की मांग जरूर करते हैं.प्रश्न उठता है कि जब आवाह्न तुमने   किया तो मुआवजा सरकार क्यों दे।
अब इस हिंसात्मक बंद के बाद शासन,प्रशासन, पुलिस व न्यायालय अपने-अपने काम करेंगे।हिंसा करने के नाम पर कुछ ऐसे लोग भी कानूनी लपेटे में आएंगे जो केवल उस भीड़ के अंग थे जो केवल भावना में बह कर भीड का अंग तो बन गये पर वे हिंसा या उपद्रव से दूर रहे।उनमें से बहुत से ऐसे लोग होंगे जो मेहनत मजदूरी करते होंगे ,बहुत से नौकरी पेशा लोग होंगे।अब उन्हें स्वयं को बचाने के लिए कोर्ट कचहरी व थानों में अपना कीमती समय देना पड़ेगा। पर परदे के पीछे से डोर हिलाने वालों पर शायद ही कोई आंच आ पाए।

Nagendra Prasad Raturi

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